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हमें अपनी कोख का इतना घंमड क्यों है??

70 बरस की आजादी के बाद 2018 के आधुनिक भारत के दौर में जब यह शीर्षक लिखा जा रहा है। हमें अपनी कोख का इतना घंमड आखिर है क्यों? इस विमर्श के निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले इसकी बुनियाद समझिए। पूरे भारत में और उसमें भी विशेषकर उत्तर भारत में लोगों में अपनी जातीय पहचान को लेकर बेहद संवेदनशीलता है। जातीय पहचान का तात्पर्य है आपने समाज में स्थापित वर्ण व्यवस्था के किस वर्ण में जन्म लिया। यही से कोख का घंमड जन्म लेता है। कहीं पर किसी को गर्व है इस बात का कि उसने एक ब्राह्णणी की कोख से जन्म लिया तो कहीं जातीय व्यवस्था में तथाकथित रूप से नीचे होने के कारण दलित होने पर शर्म है। कुलजमा यह कुतर्क आन पड़ा है कि अपनी कोख का इतना घंमड हैं पर यह सोचिए क्या यह आपका चुनाव था। यह प्रकृति निर्धारित व्यवस्था थी जो आपको प्राकृतिक रूप से स्वतः ही मिली तो इस तमगे को आत्मसम्मान का विषय बना लिया है। कोख का इतना घंमड किसी भी सूरत में न्यायोचित नहीं है, जाति के तमगे को अपनी छाती से चिपकाकर घूमने वाले ये बुद्धिभ्रष्ट लोग यह समझने में नाकाम है कि अब मुल्क में संविधान है एवं अब सभी लोग बराबर है तो कोख पर घंमड अब मुनासिब नहीं।

यह जातीय व्यवस्था की बुनियाद आयी कहाँ से –

हमें अपनी कोख का इतना घंमड क्यों है
भारतीय समाज का कोख का इतना घंमड जातीय व्यवस्था से जुड़ा है। इस व्यवस्था की एक थ्योरी यह है कि आर्यन्स मध्य एशिया से आए एवं उन्होनें दक्षिण एशिया पर अपना सामाज्र्य स्थापित किया तथा 1500 BC में जातीय व्यवस्था की शुरूआत की। बाद में देश आजाद हुआ, संविधान बना, सभी को एक बराबर माना गया, पर काश यह कोख का घंमड भी बराबरी के स्तर तक आ पाता। आज भी गाँव-देहात के दूरदराज इलाकों में यह समस्या आम है दलितों की बस्तियाँ, उनके कुँए, तालाब, उनके शादी-ब्याह गाँव के एक अलग छोर पर स्थापित किये जाते है। जैसे वे किसी मंगल ग्रह से आए हो, एलियन हो। मैला ढोने, नालियाँ साफ करने सरीखे काम सिर्फ दलितों के ही मत्थे मढ़े जाते हैं। ऐसा कतई नहीं है कि यह काम छोटा होता है पर सवाल है कि यह काम सिर्फ समाज के कथित रूप से नीची जाति आधारित दलित तबका ही क्यों करें। यह कोख का घंमड ही है वरना क्यों कोई ब्राह्मण परिवार का बच्चा मैला नहीं ढो सकता। कथित रूप से नीची जाति के साथ समान व्यवहार आज भी विरले रूप में ही मिलता है, इस त्रासदी को महसूस करना चाहते हैं तो ओमप्रकाश वाल्मिकी का “जूठन” उपन्यास आपको जरूर पढना चाहिए जो दो खंडों में प्रकाशित है। इसे पढकर आप उस भारत की घिनौनी तस्वीर पर रोए बिना नहीं रह सकते जहाँ लेखक ने कोख का इतना घंमड कितना वीभत्स हो सकता है, उसके सबसे घिनौने चेहरे को ज्यों-त्यों रख दिया है।

कोख का इतना घंमड - "जूठन" उपन्यास

किस तरह चूर होगा यह कोख का इतना घंमड –

जातीय व्यवस्था और तिस पर जातीय गर्व किसी कोढ़ में खाज के समान है। भारत की आजादी के 70 बरस बाद भी अपनी जातीय पहिचान, यह कोख का घंमड बरकरार है!! हाँ, यह एक दिन में तो खत्म नहीं होगा पर एक दिन जरूर होगा। इस कुकृत्य में जनता एवं राजनेता दोनों ही समान रूप से दोषी है। जनता जब तक प्रत्याशी की जाति को देखकर वोट करती रहेगी, इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहेगी। पार्टियाँ जातीय समीकरण देखकर प्रत्याशी नियुक्त करेगीं उसके बाद वोटर जाति देखकर वोट देगा, सो यही कोख का इतना घंमड पल्लवित-पुष्पित होता रहेगा। यह कुचक्र इस तरह निरंतर चलता रहेगा एवं यह कोख का घंमड फिर जाने से रहा, जो बहुत दुखद एवं कष्टप्रद है। इसलिए बेहद जरूरी है कि सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, बराबरी जैसे जरूरी मुद्दों पर बात की जाए ताकि यह कोख का इतना घंमड समाज में हाशिये तक पहुँचे साथ ही जागरूकता फैलायी जाये। इसका एक रामबाण तोड़ यह भी है कि अंत:जातीय विवाह को प्रोत्साहन दिया जाए ताकि कथित रूप से ऊँची एवं नीची जाति के बीच एक सौहार्द, प्रेमपूर्ण एवं समन्वय के संबंध स्थापित किए जा सके ताकि इस कोख के घंमड के निकृष्ट स्तर समाप्त किया जा सके।

निष्कर्ष:- 

मुझे इसका निष्कर्ष लिखते हुए राम मनोहर लोहिया याद आते हैं। समाजवाद के इस महान प्रवर्तक ने कहा था कि जब तक सभी जातियों में रोटी एवं बेटी का संबध स्थापित नहीं हो जाता तब तक समाज में एकरूपता स्थापित नहीं की जा सकती। तब तक यह कोख का इतना घंमड नहीं जाएगा हाँलाकि इसमें आधी सफलता तो प्राप्त इस स्तर पर की जा चुकी कि अब पंगत सिस्टम पूरी तरह से गायब हो चुका है। शादी-समारोह के दावत में पंगत की जगह अब बुफे ने ले ली है। आप जिस थाली में खाते है आपको नहीं पता कि आपसे पहले उस थाली में किस कोख के जन्मे कथित रूप से नीची जाति के व्यक्ति ने खाना खाया है या कथित ऊँची जाति की माँ की कोख से जन्मे के व्यक्ति ने, यहाँ कोख की  घंमड का बेस्ड लाॅजिक कट जाता है। पर बेटी का संबंध आज भी समाज में नहीं कायम हो सका है, मैं बहुत जिम्मेदारी से इस बात की पुनरावृत्ति करना चाहता हूँ आप स्वयं को जातिविरोधी होने का सर्टिफिकेट पाने के लिए ही अंतर्जातीय विवाह मत कीजिए चूँकि यहाँ सवाल दो जिंदगीयों का है पर आप समाज की दी हुई इस जाति व्यवस्था पर थूकने का साहस कीजिए। उठिए!! और बोलिए क्योंकि अगर आज यह कोख का इतना घंमड खत्म नहीं हुआ तो कल यह एक विकराल समस्या का रूप धारण कर लेगा।

 

 

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हमें अपनी कोख का इतना घंमड क्यों है ? पढ़िए और समझिये
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One Thought to “हमें अपनी कोख का इतना घंमड क्यों है??”

  1. Ravi Arsd

    बिल्कुल सहमत है आपकी बात से!!

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